भारत में राजनीतिक और संवैधानिक भूचाल: चुनाव आयोग के भीतर

भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी)—आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग और हार्वर्ड से अर्थशास्त्र की डिग्री प्राप्त करने वाले 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी—ज्ञानेश कुमार इस समय देश की राजनीति और चुनावी बहसों के केंद्र में हैं। गृह मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय में कई बड़े नीतिगत फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वे इस समय उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रहे हैं।

निर्वाचन सदन के बंद दरवाजों के पीछे इस समय देश का सबसे बड़ा सियासी और संवैधानिक बवंडर चल रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ऐसे दहकते तवे पर बैठे हैं जहां एक तरफ समूचा विपक्ष उनके खिलाफ महाभियोग के तेवर दिखा रहा है, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग के अपने ही कमरे असंतोष और असहमति की आवाजों से गूंज रहे हैं!

1. हालिया मुद्दे और विवाद: आयोग के भीतर बगावत — 'वन-मैन शो' के आरोप

आंतरिक मतभेद: हालिया मीडिया रिपोर्टों और आंतरिक ज्ञापनों ने भारतीय प्रशासनिक हलकों में सनसनी मचा दी है। खबरों से पता चलता है कि तीन सदस्यीय संवैधानिक पीठ—जिसमें सीईसी ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं—में सब कुछ सामान्य नहीं है।

असहमति की आवाजें: आयोग के आधिकारिक पत्राचार से यह सामने आया है कि कई अहम फैसलों में बहुमत की राय की अनदेखी की गई और सह-आयुक्तों ने कई बार आधिकारिक तौर पर अपना असंतोष दर्ज कराया है।

विपक्ष का हमला: विपक्ष ने सीधा हमला बोलते हुए सवाल उठाया है कि क्या भारत का बहुसदस्यीय चुनाव आयोग अब केवल "एक व्यक्ति" का दफ्तर बनकर रह गया है?

2. वोटर लिस्ट और सीसीटीवी विवाद पर सियासी संग्राम

एसआईआर (वोटर लिस्ट पुनरीक्षण): कर्नाटक समेत देश के कई राज्यों में लाखों वोटरों के नाम कटने और फर्जी पते जोड़े जाने के आरोपों को लेकर राहुल गांधी और विपक्षी 'इंडिया' ब्लॉक ने सीधे सीईसी पर सत्ताधारी दल के सुर में सुर मिलाने का आरोप लगाया।

'मां, बेटी, बहू' वाला बयान: पोलिंग बूथों की सीसीटीवी फुटेज और डेटा को सार्वजनिक न करने के सवाल पर जब ज्ञानेश कुमार ने महिलाओं की निजता का हवाला दिया, तो सिविल सोसाइटी और सियासी दलों ने इसे पारदर्शिता से मुंह मोड़ने का बहाना करार दिया, जिसके चलते सोशल मीडिया पर उनकी भारी आलोचना और ट्रोलिंग हुई।

3. गृह मंत्रालय के सिपहसालार से चुनाव प्रमुख तक का सफर

ज्ञानेश कुमार कोई आम नौकरशाह नहीं हैं। 1988 बैच के इस आईआईटीयन ने केंद्र स्तर पर अनुच्छेद 370 को हटाने के कानूनी प्रारूप (ड्राफ्टिंग) से लेकर गृह मंत्रालय में राम मंदिर ट्रस्ट के गठन तक में अहम भूमिका निभाई थी। बाद में अमित शाह के अधीन सहकारिता मंत्रालय के सचिव पद से रिटायर होने के कुछ महीनों बाद ही उनकी चुनाव आयोग में एंट्री हुई। विपक्ष इसी पृष्ठभूमि को आधार बनाकर उनकी निष्पक्षता पर हमलावर है।

4. आयोग का पलटवार

इस पूरे घमासान के बीच निर्वाचन सदन ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा है कि आयोग पर लगाए जा रहे सारे आरोप तथ्यहीन और राजनीति से प्रेरित हैं। मतभेद लोकतंत्र की ताकत हैं और भारतीय चुनाव प्रणाली दुनिया की सबसे पुख्ता और पारदर्शी व्यवस्था है।