आज के समय में फर्नीचर ने मनुष्य के जीवन और रहन-सहन को कितना सरल और सुगम बना दिया है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कोई व्यक्ति नया घर या स्थान बनाता है, तो वह घर तब तक अधूरा माना जाता है जब तक कि उसमें उपयुक्त फर्नीचर न लग जाए। हालांकि, जिस प्रकार आज फर्नीचर का व्यापक उपयोग देखने को मिलता है, इतिहास में इसका इस्तेमाल हमेशा से ऐसा नहीं था। वर्तमान समय में जहाँ तरह-तरह की आधुनिक डिज़ाइनों और शैलियों वाला फर्नीचर उपलब्ध है, वहीं इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में इसका स्वरूप लगातार बदलता रहा है। यदि हम मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में झाँककर देखें तो पाते हैं कि नवपाषाण और प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य अपने रहन-सहन को आसान बनाने के लिए मुख्य रूप से सीमित संसाधनों—जैसे पत्थर, लकड़ी, बांस और जानवरों की खाल का ही प्रयोग करता था। जैसे आजकल हम पार्कों, स्मारकों और कॉलेजों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर पत्थर की बेंचें देखते हैं, ठीक उसी प्रकार प्रागैतिहासिक काल में पश्चिमी यूरोप और दुनिया के शुरुआती समाजों में पत्थर का उपयोग बेंच और अलमारी के रूप में किया जाता था। उस दौर में फर्नीचर का महत्व सौंदर्यबोध या शिल्प कौशल दिखाने तक सीमित नहीं था, बल्कि सोने, सामान रखने और बैठने जैसी बुनियादी व्यावहारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए था।
जब हम प्रागैतिहासिक युग से आगे बढ़ते हुए भारतीय महाद्वीप के प्राचीन इतिहास की ओर देखते हैं, तो सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2500 ई.पूर्व) के मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे नगरों में फर्नीचर का एक बेहद व्यावहारिक और विकसित स्वरूप दिखाई देता है। मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध 'पशुपतिनाथ की मुहर' में ध्यानमुद्रा में बैठे हुए देवता को एक कम ऊँचाई वाली लकड़ी या पत्थर की चौकी (आसन) पर विराजमान दिखाया गया है, जो उस दौर की कुशल काष्ठ-कला का अद्भुत प्रमाण है। इसके अलावा हड़प्पा की खुदाई में मिली पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) की मूर्तियों में बुनी हुई खाट तथा तख्त जैसी संरचनाओं पर विश्राम करते हुए चित्र मिलते हैं, और मोहनजोदड़ो के पक्के मकानों की दीवारों में सामान रखने के लिए बनाई गई ताक और अलमारियों के स्पष्ट अवशेष प्राप्त होते हैं। आगे चलकर वैदिक काल में भारतीय साहित्य और दैनिक जीवन में 'पीठिका' (चौकी) और 'आसंदी' (ऊँचा आसन या कुर्सी) का उपयोग प्रमुखता से होने लगा, जो शीशम, सागौन और आम की टिकाऊ लकड़ी से बनाए जाते थे। इसी दौर में सूती या पटसन की रस्सी से बुनी जाने वाली पारंपरिक भारतीय चारपाई का विकास हुआ, जो दुनिया के सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक रूप से टिकाऊ डिजाइनों में से एक मानी जाती है।

प्राचीन मिस्र (Egypt) की सभ्यता में प्रवेश करते ही फर्नीचर का उपयोग केवल व्यावहारिक उद्देश्यों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ इसके प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी बदलने लगा। उच्च गुणवत्ता और नक्काशीदार फर्नीचर धन व सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया और इसे एक महत्वपूर्ण स्टेटस सिंबल के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। मिस्रवासी अपनी कुशल काष्ठ-कारीगरी के लिए प्रसिद्ध थे और उनके कई ऐतिहासिक डिज़ाइन आज भी संरक्षित हैं। वहीं दूसरी ओर, प्राचीन यूनानी (ग्रीक) फर्नीचर मुख्य रूप से व्यावहारिकता और सादगी पर केंद्रित था, जहाँ लकड़ी के ढाँचे और बुनी हुई सीटों वाली कुर्सियाँ व स्टूल सबसे आम थे। सदियों के इस विकासक्रम के बाद उत्तर-आधुनिकतावाद ने "रूप कार्य का अनुसरण करता है" की पारंपरिक धारणा को खारिज करते हुए एक विद्रोही शैली प्रस्तुत की, जिसमें उपयोगिता से अधिक कलात्मकता को प्राथमिकता दी गई।
आज वर्तमान समय में फर्नीचर उद्योग और इसका डिज़ाइन अत्यधिक विकसित हो चुका है। अब लकड़ी के अलावा धातु, कांच, प्लास्टिक और कई कंपोजिट सामग्रियों का उपयोग करके आधुनिक फर्नीचर तैयार किया जा रहा है। भारत में राजस्थान के नक्काशीदार पीढा शिल्प व गुजरात की सांकड़ा काष्ठ-कला से लेकर आज के मॉड्युलर फर्नीचर तक डिजाइनों ने एक लंबा और समृद्ध सफ़र तय किया है। अधिक सामग्रियों की उपलब्धता से लेकर विशिष्ट निर्माण तकनीकों के माध्यम से मनचाहे परिणाम प्राप्त करने तक, फर्नीचर डिज़ाइन लगातार विस्तृत होता गया है और आज का समकालीन डिज़ाइन व्यावहारिकता और कलात्मक सौंदर्य—दोनों का एक सुंदर संतुलन बनकर हमारे सामने आया है।