राइट कॉर्नर डिफेंडर से एशियन गेम्स तक का सफ़र—
गौरव खत्री नरेला, दिल्ली के रहने वाले हैं। वह एक साधारण परिवार से हैं। इनके भारतीय कबड्डी टीम में जाने तक का सफ़र बहुत ही रोमांच भरा है। हाल ही में नागोया, जापान में खेले गए एशियन गेम्स 2026 में, इन्होंने कबड्डी में स्वर्ण पदक भारत के नाम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गौरव ने लगभग 15 साल की उम्र में स्थानीय टूर्नामेंट खेलना शुरू कर दिया था। इन मैचों ने उन्हें अनुभवी खिलाड़ियों का सामना करने और वास्तविक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से रक्षा (डिफेंस) की मूल बातें सीखने का मौका दिया। शुरुआती साल बहुत महत्वपूर्ण थे, क्योंकि वह विभिन्न प्रकार के रेडर्स के खिलाफ खेलकर पोजिशनिंग, टाइमिंग और टैकल को समझने में सक्षम हुए।
खत्री के लिए कबड्डी सिर्फ एक खेल नहीं, उससे कहीं अधिक बन गया, क्योंकि वह स्थानीय प्रतियोगिताओं के माध्यम से आगे बढ़े। उन्होंने दिल्ली और उत्तराखंड में प्रतियोगिताओं में खेलना जारी रखा, जहाँ उन्हें अधिक मैच अभ्यास मिला और एक डिफेंडर के रूप में उनका आत्मविश्वास पैदा हुआ। उन्होंने अपने करियर के इस चरण के दौरान कई स्थानीय टूर्नामेंट जीते।
उनका शुरुआती करियर मुख्य रूप से रक्षा पर केंद्रित था। एक दाएं कोने (राइट कॉर्नर) के खिलाड़ी के रूप में, उन्होंने उन तकनीकों पर काम किया जो सीमा के करीब हमलावरों को रोक सकती थीं। टखने की पकड़ (एंकल होल्ड) उनकी शैली से जुड़ी खास चालों में से एक बन गई, जबकि उनका उपयोग उन स्थितियों में भी किया गया जहाँ एक त्वरित टैकल की आवश्यकता होती है।
खत्री की निरंतर प्रगति ने अंततः उन्हें प्रो कबड्डी सेटअप के ध्यान में लाया। पीकेएल में एक जाना-पहचाना नाम बनने से पहले, खत्री ने कई स्थानीय कबड्डी टूर्नामेंट खेले। दिल्ली और उत्तराखंड उन स्थानों में से थे, जहाँ उन्होंने मूल्यवान खेल अनुभव प्राप्त किया। इन मुकाबलों ने उन्हें नियमित रूप से प्रतिस्पर्धा करने, पुराने (वरिष्ठ) खिलाड़ियों से सीखने और अपने रक्षात्मक खेल को तेज करने की अनुमति दी।
उनका स्थानीय करियर उनकी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि उन्होंने प्रमुख राष्ट्रीय उपलब्धियों की लंबी सूची के साथ पेशेवर लीग में प्रवेश नहीं किया था। इसके बजाय, वह नियमित प्रतियोगिताओं के माध्यम से ऊपर की ओर बढ़ते गए।
साथ ही, उनके पिताजी भी स्थानीय कबड्डी खेलते रहते थे, जिसका कहीं न कहीं असर गौरव के ऊपर भी पड़ा था, जिसने आज उनको इस मुकाम पर लाने में प्रेरणा का काम किया।
इंजरी रिप्लेसमेंट से इंडिया टीम की जर्सी तक का सफ़र इन्होंने अपनी मेहनत से तय किया। सीजन 9 में एक इंजरी रिप्लेसमेंट के रूप में इनको एंट्री मिली और अपनी सुपर टैकल से इन्होंने सबको हैरान कर दिया। अपनी मेहनत से सीजन 10 में पुनेरी पलटन के लिए 69 टैकल पॉइंट से टीम को चैंपियन बनाया और लीग के सबसे रिलायबल डिफेंडर बने। ऐसा ही प्रदर्शन उन्होंने आगे के सीजनों में भी किया और इसी मेहनत व शानदार प्रदर्शन के बल पर इन्हें इंडियन कबड्डी टीम के 12 सदस्यीय स्कॉड में शामिल किया गया था। यहाँ भी इन्होंने टीम के साथ मिलकर भारत के नाम स्वर्ण पदक हासिल किया। एक समय पर वह बस रिप्लेसमेंट थे और आज इंडिया की शान हैं। इस कहानी से यह पता चलता है कि मौका तो छोटा था, लेकिन मेहनत बहुत बड़ी थी, जिसके कारण यह सफलता प्राप्त हुई।